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विचार से विकास

पांवटा साहिब का यमुना घाट बना आस्था का केंद्र, नमकीन विक्रेता बना ‘जल योद्धा’, सात दिन में चार श्रद्धालुओं की बचाई जान – स्थायी गोताखोर दल की उठी मांग

आस्था, श्रद्धा और जोखिम—इन तीन शब्दों में सिमटता जा रहा है पांवटा साहिब का ऐतिहासिक यमुना घाट। इन दिनों यहां देशभर से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंच रहे हैं। उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों से आस्था से ओतप्रोत लोग यमुना नदी में डुबकी लगाकर मोक्ष की कामना कर रहे हैं। मान्यता है कि यमुना घाट पर स्नान करने से पाप नष्ट होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

लेकिन इस आस्था के सैलाब के बीच खतरा भी बराबरी से मंडरा रहा है। हर वर्ष यहीं पर कई श्रद्धालु डूबने से अपनी जान गंवा बैठते हैं। सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के अभाव में यह घाट हादसों का केंद्र बनता जा रहा है। इस बार भी मामला कुछ अलग नहीं है। बीते सात दिनों में चार श्रद्धालु यमुना में डूबते-डूबते बचे, और उन्हें मौत के मुंह से खींच लाने वाला कोई सरकारी गोताखोर नहीं, बल्कि नमकीन बेचने वाला एक स्थानीय युवक निकला है।

यह युवक न तो प्रशिक्षित है, न ही प्रशासन की ओर से अधिकृत, लेकिन इंसानियत और बहादुरी की मिसाल बन चुका है। जिस समय लोग घाट पर प्रसाद व स्नान कर रहे होते हैं, वह अपनी नजरें नदी पर जमाए रहता है – और जैसे ही कोई संकट में आता है, बिना वक्त गंवाए कूद पड़ता है।
यमुना घाट पर लगातार बढ़ती भीड़ और आगामी बारिश के मौसम में संभावित जलस्तर वृद्धि को देखते हुए स्थानीय लोगों और मंदिर समिति के सदस्यों ने प्रशासन से अपील की है कि घाट पर प्रशिक्षित गोताखोरों की स्थायी टीम तैनात की जाए।

स्थानीय निवासी कहते हैं कि “हर साल डूबने से लोगों की मौत होती है। अब जब एक आम नागरिक अपनी जान की परवाह किए बिना चार लोगों को बचा सकता है, तो प्रशासन क्यों चुप है?”
बारिश के मौसम में यमुना का बहाव और गहराई दोनों बढ़ते हैं। ऐसे में यदि समय रहते प्रशासन नहीं चेता, तो आने वाले समय में बड़ा हादसा हो सकता है। भीड़ बढ़ रही है, लेकिन सुरक्षा के नाम पर घाट पर न तो कोई चेतावनी बोर्ड हैं, न ही लाइफ जैकेट्स या रस्सी की व्यवस्था।

श्रद्धालु भी नियमों की अनदेखी करते हुए गहरे पानी में चले जाते हैं। यही लापरवाही कभी-कभी जानलेवा बन जाती है। इसलिए अब सिर्फ जागरूकता नहीं, ठोस व्यवस्था की जरूरत है।