इन दिनों देश सहित प्रदेश में भी भीष्ण गर्मी का प्रभाव देखने को मिल रहा है। हिमाचल प्रदेश के सिरमोर जिला के मैदानी क्षेत्र बुरी तरह से गर्मी से जूझ रहे हैं।इस कड़ी गर्मी में पारंपरिक रूप से मिट्टी से बने घड़े प्यास बुझाने में अहम भूमिका निभाते आये है। मिट्टी के घड़े एक प्राकृतिक प्यूरीफायर के रूप में काम करते हैं और ठंडा तथा स्वास्थ्य वर्धक पानी के लिए जाने जाते हैं।
सिरमौर जिला मुख्यालय नाहन में कुम्हार गली इन्हीं मिट्टी के विभिन्न उत्पादों के लिए जाना जाती है। आज भी यहाँ पर अनेक प्रकार के मिट्ठी उत्पाद जैसे घड़े, सुराही, दीपक , डेकोरेशन उत्पाद मिलते हैं। लेकिन आधुनिकता की दौड़ में मिट्टी के ये उत्पाद जिसे घड़ा धीरे धीरे प्रचलन से बाहर होता जा रहा है। आज लोग फ्रिज, आर ओ के पानी को प्राथमिकता देते नजर आ रहे हैं। जिससे जहां इन मिट्टी के कारीगरों पर भी आजीविका चलाना मुश्किल हो गया है और वो लोग भी अब अपना पुश्तैनी कार्य मिट्टी उत्पाद छोड़कर अन्य व्यवसायों की तरफ मुड़ने लगे हैं।
मिट्टी उत्पादों से जुड़े कारीगर चमन ने बतायाकि यह उनका पुश्तैनी कार्य है, लेकिन अब लोग घड़े नहीं खरीदते बल्कि आर ओ लेते हैं। ऐसे में सरकारी को आगे आकर उन्हें प्रोत्साहन चाहिये ताकि वोकल फॉर लोकल पर कार्य हो।
उल्लेखनीय है कि मिट्टी से बने उत्पादों के लिए नाहन प्रसिद्ध रहा है, लेकिन आधुनिकता के दौर में और सरकारी योजनाओं के न होने से अब यह प्राचीन कला धीरे धीरे विलुप्त होने की कगार पर है। जरूरत है तो मिट्टी कार्य से जुड़े इन लोगों को सरंक्षण देने की।