ऐतिहासिक नाहन शहर का लोअर कैंट एरिया…! यहीं समीप जलापड़ी में स्थित है माता संसारी मंदिर। कहते हैं 101 वर्ष पूर्व यानि प्रथम विश्व यु़द्ध के समय सन 1918-1919 में जब स्पैनिश फलू के कारण महामारी फैली थी। उस समय सिरमौर रियासत में तैनात सैनिक इन्द्र सिंह गुरंग ने यहां महामारी को रोकने के लिए संसारी माता मंदिर की स्थापना की थी। जनश्रुति है कि उस समय संपूर्ण देश में महामारी का प्रकोप फैल चुका था। किन्तु कालाआंब से उपर नाहन क्षेत्र में महामारी का प्रकोप नहीं हो पाया था।जलापड़ी स्थित संसारी माता मंदिर 100 वर्षाे से अधिक समय से गोरखा समुदाय की आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है। माता संसारी मंदिर, जलापड़ी में प्रथम पूजा महामारी के बीच रियासतकाल में सन 1919 में प्रारम्भ हई थी। समुदाय के बुजुर्गों का कहना है कि यह पूजा सन 1919 में उस समय शुरू हुई जब काला आंब तक महामारी का प्रकोप फैल चुका था। नाहन के लोग इस महामारी की वजह से डरे हुए थे। क्योंकि इस महामारी ने पूरे देश में मौत का तांडव मचा रखा था। इसी बीच सिरमौर रियासत के सैनिक परिवार के गोरखा समुदाय के लोेगों ने नेपाल की तर्ज पर नाहन में ‘माता संसारी’ की पूर्जा अर्चना की ताकि इस महामारी का प्रभाव नाहन क्षेत्र पर न हो।सन् 1919 से लेकर अब तक गोरखा समुदाय के लोग माता संसारी देवी की पूजा अर्चना हर वर्ष जयेष्ठ माह के पहले रविवार को करते हैं। माता संसारी की यह पूजा नाहन के जलापड़ी के अलावा मझौली कोटड़ी और शंभुवाला में भी आयोजित की जाती है। इसके अलावा सोलन, सुबाथु, धर्मशाला और चंबा में भी माता संसारी की पूजा गोरखा समुदाय द्वारा माह मई में ही की जाती है।सिरमौर गोरखा सभा के यूथ कन्वीनर अंकुर थापा कहते हैं:‘‘जलापड़ी स्थित माता संसारी मंदिर में गोरखा समुदाय के लोगों की अपार श्रद्धा है। हर वर्ष समुदाय के लोग धूमधाम के साथ पूजा अर्चना करते हैं। यहां पूजा-पाठ का क्रम एक सदी यानि 100 वर्षों से निरंतर चला हुआ है। पहले बुजुर्ग इस कार्य को देखते थे, अब अगली पीढ़ी इस कार्य को संभाल रही है..! ’’ सिरमौर गोरखा सभा के अध्यक्ष खेम बहादुर, योगिन्द्र गुरंग, विनोद गुुंरग, रमेश थापा, शमशेर, जंगबीर, शकुन्तला गुरंग, श्याामा गुंरग, उषा, इश्वर, राधा, सुमन थापा आदि कहते हैं कि 100 साल पहले भी मां संसारी ने हमे महामारी के प्रकोप से बचाया था, और आज भी माता की कृपा से नाहन क्षेत्र महामारी के प्रकोप से बचा हुआ है…!’’ कहते हैं इतिहास अपने आपको दोहराता है…! आज जब हम कोविड- 19 यानि चाईनिज कोरोना वायरस के कारण संकट से गुजर रहे हैं। दुनिया में लाखों लोग कोरोना के संकमण्र से ग्रसित है। जीवन संकट में है, भोजन और रोजगार के लाले पड़े हुए हैं। कोरोना के कारण देश में आर्थिक स्थिति खराब होने लगी है। भारत में करीब 681 लोग अभी तक भारत में इस महामारी से अपनी जाने गंवा चुके हैं।ठीक इसी प्रकार 1919 में स्पैनिश फलू के कारण भारत में महामारी आई थी। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन था, यानि अंग्रेज भारत में राज करते थे। जिसमें दावा किया गया है कि दुनिया मे 5 से 10 करोड़ लोगों की जान इस महामारी से गई थी। इसमें 14 लाख ़भारतीयों की जान गवांई थी। हालांकि इस आंकड़े पर मत भिन्नता है। इतिहासकारों का मत है भारत में मरने वालों की संख्या इससे भी कहीं अधिक थी।वर्ष 1918 में बाम्बे में हुई थी फलू की एंटरीं।कहते हैं कि 1918 में सबसे पहला फलू का मामला बाम्बे में आया था। यहां फलू ने तांडव मचाया था। एक सैनिक जहाज के भारत लौटने पर स्पैनिश फलू यहां फैला था। सबसे ज्यादा मौते सबसे अधिक जन संख्या वाले बाम्बे में हुई थी। इसके अलावा असम में इस गंभीर फलू को लेकर एक इंजेक्शन तैयार किया गया जिसे कथित तौर पर हजारों मरीजों का टीकाकरण किया गया, जिसकी वजह से इस बीमारी को रोकने में कुछ कामयाबी मिली।बताते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को उनके गुजरात के आश्रम में ही फलू हो गया था। बापू गांधी इसकी वजह से लंबे समय तक बीमार रहे। इस दौरान उन्होंने केवल तरल पदार्थ का सेवन किया। ईश्वर की कृृपा से उनकी जान बच गई। उस समय गांधी जी की आयु 48 वर्ष थी और करीब 4 वर्ष पूर्व ही दक्षित अफ्रीका से वापिस लौटे थे।हिन्दी के मशहूर लेखक और कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की पत्नी और घर के कई सदस्य इस बीमारी की भेंट चढ़ गए थे। निराला जी ने अपने संस्मरण में लिखा था -‘‘मेरा परिवार पलक झपकते ही मेरी आंखों से ओझल हो गया। गंगा नदी शवों से पट गई थी। चारों ओर इतने शव थे कि उन्हें जलाने के लिए लकड़ी कम पड़ रही थी। स्थिति खराब तब हो गई जब खराब मौनसून की वजह से सूख पड़ गया और आकाल जैसी स्थिति बन गई…!’’*साभार : राजेंदर आनंद राज नाहन