Sirmaur Uday

विचार से विकास

घर से बेघर हुए ये   सिरमौरी , इनका दुख दर्द कौन समझेगा?

शिमला के रिज मैदान, माल रोड से ए जी  चौक तक यह बुजुर्ग अक्सर बच्चों की गाड़ी ,प्रैम लेकर टूरिस्टों के साथ चलते दिखाई देते हैं।जब कोई टूरिस्ट  इनसे नाम व पता पूछता है तो यह बुजुर्ग बड़े गर्व से अपने आप को सिरमौरी होने की बात कहते हैं। उम्र के इस पड़ाव में भी मेहनत कर अपना और अपने परिवार का पालन पोषण करना निश्चित तौर पर गर्व की बात है। उनकी लगन और जज्बा कर्म की महत्ता   को भी दर्शाता है । इसलिए कहा जाता है  कि पहाड़ के लोग गरीबी में रह सकते हैं परंतु कभी भीख मांगने  वाले , नहीं हो सकते।

जीवन में मेहनत करके कमाने का अपना ही आनंद है ।इसके साथ-साथ कहानी का दूसरा पहलू यह भी है कि ये लोग खुशी से यहां नहीं आए हैं इन्हें कोई न कोई मजबूरी यहां लेकर आई है। सिरमौर जिला के जिस क्षेत्र से ये लोग शिमला में मजदूरी करने आते हैं वहां न तो रोजगार है और न ही  भूमि इतनी उपजाऊ है कि कोई भी व्यक्ति संपन्नता के साथ दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर सके। शिलाई और रेणुका विधानसभा क्षेत्र के कुछ दूर दराज के क्षेत्र से लोग यहां मजदूरी करने आते हैं।

70 के दशक के दौरान तक इन दोनों क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में अदरक का उत्पादन होता था जिससे हर छोटे किसान का भी साल भर का गुजर बसर आसानी से चलता था। यूरिया के चलन और अदरक की बीमारी ने सिरमौर के दूर दराज के क्षेत्रों की आर्थिक स्थिति चौपट कर रख दी।

इन क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि बहुत कम है और गुजर बसर का कोई अन्य साधन भी नहीं है। 1980 के बाद धीरे-धीरे दूर दराज के क्षेत्र से छोटे किसानों का पलायन शिमला की ओर होने लगा और यह लोग शिमला के लोगों की भाषा में सिरमौरी कहलाने लगे।

सिरमौर के इन दूर दराज के क्षेत्र की आज भी स्थिति काफी हद तक वैसे ही है।रोजगार के साधन सीमित हैं जनसंख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है। ऐसे में गुजर बसर के लिए गरीब आदमी जाए तो जाए कहां? अपनी भाग्य की बागडोर नेताओं के हाथ में सौंप कर यह लोग 50 वर्षों से इंतजार कर रहे हैं कि कोई तो होगा जो उनका भाग्य बदल सकेगा कोई तो होगा जो उनके लिए सौभाग्य लेकर आएगा।
धर्मेंद्र ठाकुर ,पूर्व डिप्टी  डाइरेक्टर लोक सम्पर्क विभाग