Sirmaur Uday

विचार से विकास

जिमीकंद की उन्नत किस्म गजेंद्र बनी किसानो की आर्थिकी सुदृढ़ बनाने का सशक्त माध्यम

हिमाचल प्रदेश में सर्दियों में खासकर जिमीकंद की सब्जी की बड़ी मांग रहती है और विवाह समारोहों में जिमीकंद एक अच्छी डिश के रूप में जाना जाता है। इसके इलावा भी अधिकांश लोग जिमीकंद को अपने दैनिक आहार में प्रयोग करते हैं। पारम्परिक जिमीकंद जोकि सिरमौर के अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में उगाया जाता है लेकिन वो बहुत लम्बे समय में जैसे 2 से 3  वर्ष में तैयार होता है। लेकिन अब प्रदेश में प्राकृतिक खेती की लोकप्रियता व् नई वैज्ञानिक सोच के चलते एक नई किस्म  गजेंद्र ईजाद की गयी है। इस की विशेषता यह हैकि एक तो यह 8 से 9  महीनो में तैयार हो जाता है ,दूसरे इसमें ऑग्जिलेट  कंटेंट कम होते हैं यानि की इसे साधारण रूप से खाया जा सकता है। इसमें स्वास्थय  मित्र कई गुण  होते हैं।

आत्मा परियोजना के तहत नाहन सहित जिला में कई स्थानों पर किसानो को जिमीकंद की यह हाइब्रिड वेरायटी उपलब्ध कराई गयी तब से किसानो की आमदनी भी बढ़ने लगी है। कई किसान इस खेती से जुड़े हुए हैं और अच्छी आय कमा रहे हैं। इस जिमीकंद की खेती में कोई रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं होता और गोबर खाद ,जीवामृत और देसी तरीकों से खेती की जाती है।

आत्मा परियोजना सिरमौर के निदेशक डॉ साहेब सिंह बे बतायाकि लगभग 2 वर्ष पूर्व यह उन्नत किस्म का बीज किसानो को निशुल्क दिया गया था और इसके परिणाम बहुत सुखद आये हैं और किसानो के लिए उत्साहवर्धक हैं। आज जिला में 30 के लगभग किसान इस खेती को अपना चुके हैं और नए इसमें जुड़ने लगे हैं,इस किस्म खासियत है इसका जल्द तैयार होना और वजन में भी अधिक होना ,जोकि पारम्परिक जिमीकंद की तुलना में कई गुना अधिक है और किसानो की आर्थिकी सुधारने का अच्छा माध्यम सिद्ध हो रहा है।