Sirmaur Uday

विचार से विकास

पातालेश्वर मंदिर.यहां जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करने से रोग, कष्ट और मानसिक परेशानियों से मुक्ति मिलने की मान्यता है।

पातालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व को लेकर भव्य तैयारियां जोरों पर हैं। मंदिर परिसर को दुल्हन की तरह सजाया जा रहा है। रंग-रोगन व सजावट का कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है। श्रद्धालुओं का आगमन भी शुरू हो चुका है। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी 15 फरवरी को महाशिवरात्रि के अवसर पर एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है। उत्तराखंड और हरियाणा सहित आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में भक्त भगवान शिव के दर्शन के लिए पातालेश्वर मंदिर पहुंचते हैं।

पातालेश्वर मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि लोगों की गहरी आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई हर दुआ पूरी होती है। श्रद्धालु वर्षों से अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए यहां पहुंचते आ रहे हैं।पातालेश्वर मंदिर का इतिहास अत्यंत प्राचीन और पौराणिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि यह मंदिर स्वयंभू शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध है। जनश्रुतियों के अनुसार, यह शिवलिंग पाताल लोक से जुड़ा हुआ है, इसी कारण इस मंदिर का नाम पातालेश्वर पड़ा।स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह स्थान तपस्या और साधना की भूमि रहा है। वर्षों से यह मंदिर क्षेत्र के लोगों की आस्था और विश्वास का प्रतीक बना हुआ है।

पातालेश्वर मंदिर में स्थापित शिवलिंग को अत्यंत चमत्कारी माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यह शिवलिंग स्वयं प्रकट हुआ है। शिवलिंग भगवान शिव की निराकार शक्ति का प्रतीक है, जो सृष्टि के सृजन, संरक्षण और संहार का प्रतिनिधित्व करता है।
यहां जलाभिषेक और पूजा-अर्चना करने से रोग, कष्ट और मानसिक परेशानियों से मुक्ति मिलने की मान्यता है। विशेष रूप से महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित करने का अलग ही महत्व है।
मंदिर कमेटी के सदस्य दाता राम ने बताया कि इस बार महाशिवरात्रि को भव्य रूप से मनाया जाएगा। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए विशेष व्यवस्थाएं की जा रही हैं। पेयजल, सफाई, सुरक्षा और दर्शन व्यवस्था को लेकर प्रशासन व मंदिर समिति पूरी तरह सतर्क है।