प्रकृति किसी न किसी रूप में मानव जीवन के संग रहती आयी है और पशु भी हमेशा से मानव के मित्र बनकर उभरे हैं ,कुत्ता ,हाथी ,घोड़े अनेकों बार मनुष्य के सच्चे साथी के रूप में सामने आये हैं। ऐसा ही एक उदाहरण मिलता है सिरमौर जिला मुख्यालय नाहन में जहां आज भी हाथी की कब्र पर पूजा अर्चना होती है ,बकायदा भोग चढ़ाया जाता है और भंडारे का भी आयोजन होता है।
नाहन में शिमला नाहन राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर स्तिथ है हाथी की कब्र जोकि कश्यप ऋषि मंदिर के साथ ही बनी है और यही लोग मंदिर सहित इस स्थान की देखभाल भी करते हैं और पूजा अर्चना इत्यादि यही लोग करते हैं। वैसे रविवार और वीरवार को बीमारी से त्रस्त लोग यहां पहुंचते हैं और मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर यहां गुड़ का रोट ,झाड़ू चढ़ाया जाता है।
हाथी की कब्र पर रियासत काल से बनी कब्र पर संगमरमर का पत्थर लगाया गया है जिसपर बृजराज हाथी का वृतांत हिंदी ,अंग्रेजी और उर्दू में अंकित हैं। इस कथा के अनुसार तत्कालीन महाराजा सिरमौर शमशेर प्रकाश में इसे 1914 में बृंदाबन ले सेठ लछमी चंद से खरीदा था और यह सफेद रंग का 11 फीट 9 इंच का हाथी था और महाराजा को अत्यंत प्रिय था। बृजराज की मृत्यु होने के बाद महाराजा ने उसकी यद् में यह कब्र बनाई थी।
तभी से यह स्थान पूजनीय बन गया और यहां पर अनेक प्रकार के रोगो जैसे मियादी बुखार ,तेज बुखार ,फोड़े फुंसी ,मस्से आदि होने पर यहां गुड़ का रोट चढ़ाने से ठीक हो जाते हैं। और वीरवार तथा रविवार को लोग यहां आते हैं मन्नतें मांगते हैं और पूरी होने पर गुड़ का रोट ,झाड़ू आदि चढ़ाते हैं। जोकि वहीं मोहल्ले के बच्चों में बाँट दिया जाता है,महाऋषि कश्यप मंदिर में वर्ष में एक बार यहां हवंन होता है ,हाथी की कब्र पर रोट चढ़ाया जाता है और भंडारे का भी आयोजन किया जाता है।
मंदिर समिति के नरेश कुमार ने बतायाकि महाऋषि कश्यप के मंदिर में वार्षिक समारोह के दौरान विशेष रूप से हाथी की कब्र पर भी विशेष आयोजन किया जाता है। बचपन से वो लोग यहां आते रहे हैं और दिव्य हाथी की कब्र पर मन्नतें पूरी होती हैं।